“ नमस्ते परमेशानि रासमण्डलवासिनी। रासेश्वरि नमस्तेऽस्तु कृष्ण प्राणाधिकप्रिये।। ”
राधे-कृष्ण का संबंध निस्वार्थ प्रेम, सर्वोच्च भक्ति और आध्यात्मिकता का सर्वोच्च प्रतीक है। राधाजी को कृष्ण की आंतरिक शक्ति (ह्लादिनी शक्ति) और सर्वोच्च देवी माना जाता है, जो कृष्ण को भी मोहित करती हैं। वे प्रेम, करुणा और कोमलता की अवतार हैं, और कृष्ण के बिना उनका अस्तित्व नहीं माना जाता।
संयुक्त स्वरूप: राधा और कृष्ण दो अलग-अलग सत्ता नहीं, बल्कि एक ही आत्मा के दो रूप हैं। कृष्ण को पुरुष (परमेश्वर) और राधा को प्रकृति (शक्ति) माना जाता है, जो साथ मिलकर पूर्णता का प्रतीक हैं।
निस्वार्थ प्रेम का प्रतीक: राधा-कृष्ण का प्रेम लौकिक प्रेम से ऊपर, आत्मा का परमात्मा से मिलन है। यह प्रेम निस्वार्थ, पवित्र और समर्पण का सर्वोच्च उदाहरण है।
ह्लादिनी शक्ति: शास्त्र राधाजी को कृष्ण की 'ह्लादिनी शक्ति' (आनंद प्रदान करने वाली शक्ति) कहते हैं। वे कृष्ण को आनंदित करती हैं और स्वयं भी आनंदित होती हैं।
ब्रज की लीलाएँ: कृष्ण ने अपनी बाल्यावस्था गोकुल/वृंदावन में राधाजी और गोपियों के साथ प्रेमपूर्ण लीलाओं में बिताईं।
भक्ति मार्ग: भक्त राधा-कृष्ण की पूजा करके राधाजी के माध्यम से कृष्ण को प्राप्त करने का मार्ग अपनाते हैं, क्योंकि राधाजी को कृष्ण की सबसे बड़ी भक्त माना जाता है।
अन्य नाम: राधाजी को राधिका, राधारानी, और कृष्ण को श्याम, कान्हा, मुरलीधर आदि नामों से भी जाना जाता है।